धारा 170-ख (Section 170-B) क्या है? छत्तीसगढ़ में आदिवासी भूमि खरीद-बिक्री के कड़े कानूनी नियम
✅ प्रमुख बिंदु एवं त्वरित चेकलिस्ट (Key Takeaways)
- लागू कानून: CG Land Revenue Code 1959 Sec 170-B & Sec 165(6)
- प्रभावित क्षेत्र: सरगुजा संभाग (सूरजपुर सहित), बस्तर संभाग एवं अन्य अनुसूचित क्षेत्र
- अनिवार्य स्वीकृति: जिला कलेक्टर की पूर्व लिखित अनुमति
- कानूनी स्थिति: बिना अनुमति किया गया अंतरण पूर्णतः अवैध एवं शून्य
1. धारा 170-ख (Section 170-B) का ऐतिहासिक एवं कानूनी उद्देश्य
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 170-ख (Section 170-B) राज्य के मूल आदिवासी (अनुसूचित जनजाति - ST) समुदाय की कृषि भूमि के संरक्षण हेतु बनाया गया एक अत्यंत कठोर विधिक प्रावधान है।
इसका मुख्य उद्देश्य भोले-भाले आदिवासी किसानों को छल, प्रलोभन, कर्ज़ या अनाधिकृत समझौतों के माध्यम से उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल होने से बचाना है। संविधान की 5वीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले जिलों जैसे सूरजपुर, सरगुजा, बलरामपुर, कोरिया, जशपुर, बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर आदि में यह प्रावधान सर्वाधिक प्रभावकारी रूप से लागू है।
2. क्या गैर-आदिवासी व्यक्ति आदिवासी की जमीन खरीद सकता है?
सीधा और स्पष्ट उत्तर: सामान्यतः नहीं। कानूनन कोई भी गैर-आदिवासी (General, OBC, SC आदि) किसी अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति की भूमि को सीधे नहीं खरीद सकता।
धारा 165(6) एवं 170-ख के अनुसार, यदि कोई गैर-आदिवासी किसी आदिवासी की भूमि क्रय करना चाहता है, तो इसके लिए संबंधित जिले के कलेक्टर (District Collector) की पूर्व लिखित अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य शर्त है।
कलेक्टर द्वारा अनुमति केवल दुर्लभ व असाधारण परिस्थितियों में (जैसे विक्रेता के पास पर्याप्त अन्य कृषि भूमि शेष हो, गंभीर बीमारी का इलाज, या अत्यंत अपरिहार्य कारण) पूरी सघन जांच के बाद ही दी जाती है। बिना कलेक्टर की विधिवत अनुमति के की गई कोई भी रजिस्ट्री कानून की नज़र में शून्य (Void ab initio) होती है।
3. बेनामी सौदों व GPA (पॉवर ऑफ अटॉर्नी) पर जमीन लेने के गंभीर खतरे
कई बार दलाल या प्रॉपर्टी डीलर खरीदारों को बहकाते हैं कि "हम पॉवर ऑफ अटॉर्नी (GPA), इकरारनामा (Agreement to Sell), या किसी आदिवासी के नाम पर बेनामी जमीन लेकर आपको कब्जा दिला देंगे।" ऐसे सौदों में निम्नलिखित भयानक कानूनी जोखिम होते हैं:
- स्वतः बेदखली व जमीन जब्ती: धारा 170-ख के तहत अनुविभागीय अधिकारी (SDO Revenue) को यह अधिकार है कि वह कभी भी (बिना किसी समय-सीमा के) संज्ञान लेकर गैर-आदिवासी का कब्जा हटाकर जमीन मूल आदिवासी खातेदार या उसके वारिसों को वापस सौंप दे।
- आपराधिक मुकदमा: छलपूर्वक आदिवासी जमीन हड़पने के मामलों में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम एवं IPC/BNS की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत गैर-जमानती आपराधिक प्रकरण दर्ज हो सकता है।
- पैसे की कोई वापसी नहीं: चूंकि अवैध सौदों को न्यायालय मान्यता नहीं देता, इसलिए खरीदार द्वारा दी गई पूरी रकम डूब जाती है।
4. खरीदार के लिए अचल संपदा (Achalsampada) की कानूनी सलाह
🛡️ सुरक्षा सूत्र:
- बयाना (Advance) देने से पहले B-1 में भूमि स्वामी का नाम व उपनाम (जैसे: गोंड, उरांव, कंवर, कोरवा आदि) ध्यानपूर्वक देखें।
- पटवारी से लिखित पुष्टि लें कि प्रश्नगत खसरा 170-ख की परिधि में आता है अथवा नहीं।
- अचल संपदा पर हम केवल वही संपत्तियां सूचीबद्ध करते हैं जिनका राजस्व एवं विधिक वर्गीकरण पारदर्शी हो।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Frequently Asked Questions)
क्या आदिवासी आपस में (आदिवासी से आदिवासी) जमीन खरीद-बेच सकते हैं?
हाँ, अनुसूचित जनजाति वर्ग का व्यक्ति दूसरे अनुसूचित जनजाति वर्ग के व्यक्ति से नियमानुसार जमीन खरीद सकता है, बशर्ते विक्रेता के पास 5 एकड़ असिंचित या 2.5 एकड़ सिंचित भूमि शेष बचे।
यदि किसी ने 10 साल पहले 170-ख की जमीन खरीद ली थी, तो क्या वह अब सुरक्षित है?
नहीं। धारा 170-ख में अवैध अंतरण के विरुद्ध कार्रवाई के लिए कोई मियाद (कम्प्यूटेशन लिमिटेशन) लागू नहीं होती। प्रशासन 20 या 30 साल बाद भी अवैध कब्जे को हटाकर जमीन मूल वारिसों को प्रत्यावर्तित कर सकता है।
सूरजपुर में जमीन खोजते समय 170-ख से कैसे बचें?
हमेशा गैर-आदिवासी (सामान्य/ओबीसी) स्वत्व वाली भूमि चुनें और मिसल बंदोबस्त (1929-30 व 1954-55) से लेकर वर्तमान B-1 तक का मालिकाना क्रम अवश्य चेक करें।
यह लेख छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 एवं राज्य राजस्व विभाग के नवीनतम नियमों के आधार पर आम नागरिक की विधिक जागरूकता हेतु तैयार किया गया है।